एक शाम बापू के नाम

महात्मा गांधी
सत्य अहिंसा को अपनाकर
जीवन को साकार किया।
एक वस्त्र में खुद को रखकर
जन जन का उद्धार किया।।

बाल्य काल में शिक्षा सेवा
योग मार्ग को अपनाया।
जन हितकारी न्याय के खातिर
देश विदेश में पधराया।।

जननी जन्मभूमि का प्यार
दिल में हर पल भरा रहा।
कष्ट बथेरे सहकर भी
सेवा पथ पर अड़ा रहा।।

कर्मशील योगी के आगे
हार फिरंगी भाग गया।
आजाद हुआ भारत अपना
नवजीवन अब जाग गया।।

तनय कर्मचंद का मानो
काल के आगे हार गया।
अहिंसा के मंदिर में
कलयुग पांव पसार गया।।

आजाद देश मतलब के आगे
खूनी पंथ कटार हुआ।
हिन्द पाक हो खून के प्यासे
झेलम के दोनों पार हुआ।।

देख महात्मा का अन्तर्मन
पीड़ित तार तार हुआ।
अहिंसा का उपदेशक
हिंसा का शिकार हुआ।।

तन छूट गया न अंत हुआ
अविनाशी उस आत्मा का।
विनयचंद रे बनो उपासक
सत्य पथिक महात्मा का।।

पं़ विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘

एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया

एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।
तुम कपटी हुई , उससे धोखा किया ।।
नारी तो होती है ममता की मूरत।
क्या तुझको नहीं थी उसकी जरुरत।।
ज़िन्दगी के बदले मौत का तोफा दिया।
एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।।
अमर सुधा रस का तुम में है वास।
फिर क्योंकर जहर को बनाया रे खास।।
मित्र भी गए मित्रता भी गई
पाक रिश्ते को तूने बदनाम कर दिया।।
एक परदेशी ने तुम पर भरोसा किया।

शिक्षा की चौपाल

शिक्षा की चौपाल लगी
कहाँ रहे अब पढ़ने वाले।
संभावित प्रश्नों को रटकर
कागज पर हीं बढ़ने वाले।।
कई तरह के बोर्ड यहाँ हैं
हर भाषा हैं माध्यम के।
अंग्रेजी में काम करे सब
डाले अचार माध्यम के।।
होमवर्क नहीं बच्चे करते ।
शिक्षक भी न डण्डे रखते।।
शासन का जब कहना इतना
पास करे सब पढ़ने वाले।।
शिक्षा की चौपाल लगी
कहाँ रहे अब पढ़ने वाले।।
नब्बे पे उत्तान खड़े बस
झुके हुए पैंतालीस वाले।
नम्र बने बिन का विद्या
क्या करे कम चालीस वाले।।
जितना पढ़ो गुणो तुम जादा।
कामयाबी का लेकर वादा।।
जीवन सफल बनेगा तेरा
यही बड़ों का कहना है।
‘विनयचंद ‘नहीं स्वर्ण तू
पीतल भी तो गहना है।।
आत्मबल रख रे सदा सर्वदा
जीवन पथ पर बढ़ने वाले।।
हार तुम्हारी नहीं कभी है
पौरुष निज पथ गढ़ने वाले।।

पिया कहल चोरनी

शिव गिरिजा संग आए घूमने
पृथ्वी लोक में एक बार।
कहीं पे देखा झगड़ा -झंझट
और कहीं पे देखा प्यार।।
पति -पत्नी की जोड़ी कोई
झगड़ रहे थे आपस में।
छींटाकसी और गालियों से
माहौल गरम था आपस में।।
सुन गिरिजा के मन में आया
क्यों न पूछूँ महादेव से।
पति से गाली सुनकर भी
कोई कैसे रहती प्रेम से।।
उऽऽमा तुम्हें क्या लेना इससे
फिर कभी बतलाऊँगा मैं।
घूम-घाम घर आकर गिरिजे
ले आओ कुछ खाऊँगा मैं।।
क्या महादेव आप भी
भांग रोज हीं खाते हो।
व्यंजन बहुत बने दुनिया में
बस मुझसे भांग पिसवाते हो।।
कुछ बाग लगाओ
कुछ साग लगाओ
मेरे घर में भी स्वामी अन -धन का भंडार हो ।
करूँ रसोई अपने हाथों खुशियाँ बेशुमार हो।।
करुँगा खेती तेरे करके अब तो भांग खिला दो।
अमर सुधा है तेरे हाथ में बस एक घूंट पिला दो।।
बाग लगाया साग लगाया शिवगिरिजा ने साथ में।
मेहनत और रक्षा वो करते सदा दिन और रात में।।
बात एक दिन हो गई ऐसी भोलेनाथ थे दूर कहीं।
साग तोड़ने लगी पार्वती होके अकेली तभी वहीं।।
दूर राह से चिल्लाए तब महादेव जी जोर से।
कौन चोरनी मेरे खेत में साग चुराए भोर से।।
खुशी के मारे पागल होके नाच रही थी पार्वती।
‘विनयचंद ‘की मैया मस्त हो गा रही थी पार्वती।।
कहाँ राखूँ डलिया
कहाँ राखूँ साग।
पिया कहल चोरनी
धन्य मोर भाग।।

हँसते -रोते देखा

पाकर सब नदियों का पानी
सागर को खूब मचलते देखा।
पत्थर के कलेजे रखनेवाले
हिमालय को पिघलते देखा।।
गम्भीर बड़ा आकाश मगर
हमने उसको भी रोते देखा।
सबको पाक करे जो नदियाँ
बीच कीचड़ में सोते देखा।।
‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में
किसी को हँसते -हँसते देखा।
और किसी को रोते -रोते देखा।।

कब तक हिन्दी………. भयभीत

हिन्दी के व्याख्याता एक
बोल रहे थे सेमिनार में।
हिन्दी का प्रसार हो
जन-जन और सरकार में।।
बजवाई खूब तालियाँ
बात- बात पे मञ्च से।
समय खत्म होते ही
बेमन आए मञ्च से।।
खूब अनोखे भाषण थे
मस्त महोदय खाओ पान।
आप सरीखे हो सब तो
निश्चय हिन्दी का कल्याण।।
टन-टन टन-टन घण्टी बज गई
तत्क्षण उनके खीसे से।
हलो डीयर हाउ आर यू
बाहर आए बतीसे से।।
निहार रहा था केवल मैं
सुनकर उनकी बातचीत।
‘विनयचंद ‘बतलाओ कब तक
हिन्दी रहेगी यूँ भयभीत।।

हिन्दी दिवस पर विशेष

जंगल में दाने

कबूतरों का झुंड एक
उड़ रहा था आकास में।
बीच झाड़ियों के बहुत
दाने पड़े थे पास में।।
युवा कबूतर देख-देख
ललचाया खाने के आश में ।
बोल उठा वो सबके आगे
उतर चलें चुगने को साथ में।।
ना ना करके बूढ़ा बोला
यहाँ न कोई है जनवासा।
जंगल में दाने कहाँ से आए
इसमें लगता है कुछ अंदेशा।।
क्यों दादा तू बक-बक करते
खाने दो हम सबको थोड़ा।
जल्दी -जल्दी चुगकर दाने
आ जाएंगे हम सब छोरा।।
बात न मानी किसी ने उसकी
उतर के आ गए नीचे सब।
मस्ती में हो मस्त एक संग
खाए अंखिया मीचे सब। ।
तभी गिरा एक जाल बड़ा-सा
उन मासूमों के ऊपर।
एक संग में फँस सारे
खींझ रहे थे खुद के ऊपर।।
फर-फर फर-फर करने लगे सब
आकुल-व्याकुल सारे।
दूर खड़ा था एक बहेलिया
लेकर बृझ सहारे।।
आर्तनाद करते बच्चों को
देख पसीजा बूढ़ा।
जोड़ लगाओ उठा चलो
लेकर जाल सब पूरा।।
वही हुआ सब एक साथ में
उड़ने लगे ले जाल को।
दूर कहीं जाके जंगल में
ले धरती आए जाल को।।
मूषक मित्र महान ने क्षण में
कुतर जाल को काटा।
मनमानी और लालच का फल
दुखी करे कह डांटा।।
मान ‘विनयचंद ‘ बड़ों का कहना।
लालच में तू कभी न पड़ना।।
सबसे बड़ा बल होता दुनिया में
एक साथ में रहना,
साथ साथ हीं रहना।

काव्य

अश्क आँखों से बहता हो
लबों पर मुस्कुराहट हो।
दया से दिल लबालब हो
मन में प्रेम की आहट हो।।
निकलकर भाव जो आये
वही तो काव्य है प्यारे।।
लगे प्रेमालाप में पक्षी
परम आनन्द का कायल।
लगा जो तीर- ए-शैय्याद
हुआ मुनिवर का मन घायल।।
दिया जो श्राप वाणी से
बना एक काव्य वो प्यारे।।
समझो पीड़ औरों का
विनयचंद जिन्दगानी में।
बनोगे ज्ञान का सागर
जो सेवा कर जवानी में ।।
लिखा जो कोड़े कागज पर
नहीं वो काव्य है प्यारे।।

मातु पिता भगवान

मातु पिता में ईश्वर होते
कहता भारत का ये ज्ञान।
माॅम डैड में गोड बसे है
क्या कहा फिरंगी ग्रंथ महान।।
गुरुकुल की राह भुलाए जब से।
ग्रैजुएट मूर्ख कहलाए तब से।।
ऐसा मूर्ख भला क्या जाने
अपना भी वो दिन आएगा।
जिसके खातिर सब को छोड़ा
आखिर उसी से दुत्कारा जाएगा।।

एक नात लिखूँ

मैं दिल की जज़्बात लिखूँ।
चाहता हूँ एक नात लिखूँ।।
मंदिर और मस्जिद में ढूँढ़ा
ढूँढ़ा काबा -काशी में।
गंगा और यमुना में ढूँढा
ढूँढा जलनिधि राशी में।
मिला नहीं जो मुझको
उसकी क्या मैं बात लिखूँ।
आखिर कैसे मैं नात लिखूँ।।
मौन खड़ी थी मंदिर की मूरत
कोलाहल मस्जिद में था।
एक दिन पाऊँगा मैं उसको
आखिर मैं भी जिद में था।।
तिनके में तरू तरू में तिनका
आखिर एक जात लिखूँ।
खुद में झाँक ‘विनयचंद ‘
हर डाली हर पात लिखूँ।
हर में हर जो बैठा उसकी
एक- एक सौगात लिखूँ।
इश्क ‘विनयचंद ‘कर इंसां से
लाख टके की बात लिखूँ।।

उम्र आधी काट लूँगा

सुख बटाया साथ मिलकर
दुःख भी तेरा बाँट लूँगा।
उम्र आधी कट गई है
उम्र आधी काट लूँगा।।
हर कदम पर साथ देंगे
हमने खाई थी कसम।
चल चुके हम साथ मिलकर
शेष अब है दो कदम।।
विष भरी है ज़िन्दगी
तो खुशी से चाट लूँगा।
सुख बटाया साथ मिलकर
दुख भी तेरा बाँट लूँगा।।
उम्र आधी कट गई है
उम्र आधी काट लूँगा।।

बहते पवन को किसने देखा?

न तुमने देखे न मैंने देखा।
बहते पवन को किसने देखा?
जुल्फ चुनरिया उड़ते जब जब।
बहती हवाएँ समझो तब तब।।
बादलों को जो चलते देखा।
बहते पवन को उसने देखा।।
न तुमने देखे न मैंने देखा।
बहते पवन को किसने देखा?
चहुदिश बजती एक सीटी-सी।
तन को ठण्ड लगे मीठी-सी।।
बृक्ष लता सब हिलते देखा।
बहते पवन को उसने देखा।।
न तुमने देखे न मैंने देखा।
बहते पवन को किसने देखा?
रोसैटी के ये भाव मनोहर।
शब्दों के एक हार पिरोकर।।
‘विनयचंद ‘ नित देखा।
न तुमने देखे न मैंने देखा।
बहते पवन को किसने देखा?

वृक्ष की व्यथा

धरती जल रही अम्बर जल रहा
जल रहा सकल जहान ।
हाल कहे क्या पशु-पक्षियों के
हैं व्याकुल सब इन्सान ।।
सघन छाँव करके मैं तरूवर
सबको पास बुलाया  ।
खुद जलकर सूरज किरणों से
सब की जान बचाया ।।
खाया पीया बैठ यहाँ पर
सब भागे जल के भीतर  ।
छम-छम छप-छप छपाक -छप-छप
केहरि मृग अहिगण और तीतर  ।।
मस्त मगन हो नहा रहे सब
पशु पक्षी संग-संग इन्सान  ।
‘विनयचंद’ कोई मुझे भी ले चल
बीच दरिया में करूँ स्नान  ।।

भजन

भज ले राम राम तू राम।
योग यज्ञ व्रत देव न ऐसा, न हीं तारक धाम।
सेवा पूजा ध्यान न लावे, जप ले मात्र सुनाम।। भज…..
निश दिन पाप करे बड़ प्राणी. उल्टे सीधे काम।
राम राम गा राम को पावे. जीवन में आराम।। भज….
राम नाम ने सबरी ताड़े, ताड़े भगत तमाम।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण मीरा,ताड़े तुकाराम।।भज…..
विप्र अजामिल नारि अहिल्या, पहुँचें हरि के धाम।
‘विनयचंद ‘नर देही को तू, मत करना बेकाम।। भज ले राम

रावण दहन

रावण का पुतला जला जला
अम्बर को काला कर डला।
अहंकार का पुतला जला न पाया
खुद को रावण कर डाला।।

सत्य धर्म के ख़ातिर
वन-वन भटके नारायण।
जिनकी दिनचर्या कथा रुप में
लिखा गया रामायण।।

सेवा और त्याग की मूरत
लक्ष्मण और भरत थे सुखरासी।
स्वार्थ की बेदी पर बाली
हो गए कैसे स्वर्गवासी।।

विनयचंद रे देख तू दुनिया
बन जा मानव सुखकारी।
सेवा त्याग तपस्या से
पाओगे प्रभु दुखहारी।।
पं विनय शास्त्री

शहीद को सलाम

शरहद पर से पापा मेरे फोन किए थे शाम को।
कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को ।।
पढ़ना लिखना खेल कूद में सदा रहो तुम आगे।
दादा दादी और अम्मा का रखना ध्यान बड़भागे।।
तेरे खातिर ढेर खिलौने लाऊँगा मैं ईनाम को।।
कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को।।
देख नहीं सकते दादाजी कान न सुनते दादी की।
फिर भी सुनाते हमें कहानी शरहद के शहजादी की।।
अम्मा मेरी पूजा करती सदा आपके नाम को।
जल्दी आना पापा मेरे अपने घर और गाम को।।
ठीक ठाक से रहना पापा अपना ख्याल खुद रखना।
नहीं चाहिए मुझे खिलौने बन्दूक लेकर आ जाना।।
फौजी बनकर मैं भी पापा रक्षा करूँ आवाम को।
हुआ सबेरा घर बाहर मचा तहलका था भारी ।
दौड़ दौड़कर हँसता रोता बालक खोल किवाड़ी।।
ये नादान कैसे समझेगा आखिर इस कोहराम को।
करके फोन और गुमसुम होकर आएगें अब शाम को।।
ताबूत बीच में ओढ़ तिरंगा लेटे हो क्यों पापा।
ये आना भी कैसा आना मना रहे सब स्यापा।।
उठ जाओ और पकड़ अंगुरिया मुझे घुमाओ गाम को।
‘विनयचंद ‘के अश्रुपुष्प संग स्वीकारो एक सलाम को।।
जल्दी आना पापा मेरे अपने घर और गाम को।।

भजन

ब्रजरज का मस्तक पे चन्दन करूँ।
मैं श्रीराधे के चरणों में वन्दन करूँ।।
मैंने जीवन किए अब हवाले तेरे।
आके इसको सम्हालो दाता मेरे।
सामने किसके जाके मैं क्रंदन करूँ।
मैं श्रीराधे के चरणों में वन्दन…..

वक्त का घोड़ा

दिन गुजर जाता है
सदा सुबह शाम वाला।
वक्त का घोड़ा अगर
होता लगाम वाला।।
कोई कहीं भी इसको
सशक्ति खींच लेता।
चाबुक भला क्यों न मारे
हिलने नहीं वो देता।।
पल भर कहीं न रुकता
चलता सदा हीं जाता।
जो पीठ पर है बैठा
मंजिल वही तो पाता।।
क्षण एक न गवाओ
आलस में विनयचंद।
वरना ये द्वारे कामयाबी
हो जाएगें एकदम बंद।

राम नाम की महत्ता

सेतु बनाकर सेना संग राम गए जब लंका।
सुन लंका के गलियों में होने लगी ये शंका।।
जिसके नाम का पत्थर भी
सागर पे गया है तैर।
स्वामी तोसे करु विनती
नहीं बढ़ाओ उनसे बैर।।
चमत्कार तो राम के जैसा मैं भी कर सकता हूँ।
पत्थर क्या पूरा पर्वत पानी पर तैरा सकता हूँ।।
एक छोटा टुकड़ा ही
तैराओ जो पानी में।
मैं भी देखू दम कितना
है लंकापति की वाणी में।।
लो मंदोदरी एक पत्थर पानी में अब छोड़ रहा।
सचमुच तैर गया वह मंदोदरी का कर जोड़ रहा।।
कैसे तैरा है चमत्कार कैसा स्वामी मैं भी तो जानूँ।

राज आपके नाम का मैं भी तो पहचानूँ।।

शक्तिरूप सती नारी से सत्य नहीं छुपा पाया।

रावण नाम लिखते मेरे मन में ख्याल आया।।

रा लिखते राम कहा वण लिखते वन जाए।

विनयचंद इस रामरुप को भला कौन डूबा पाए।।……… . पं़विनय शास्त्री

तुम सबला हो

हे अबले ! तुम सबला हो।
तुम हीं शक्ति
तुम हीं भक्ति
तुम मुक्ति अचला हो ।
हे अबले ! तुम सबला हो।।
विद्या बुद्धि वाणी तुम हो।
अन्नपूर्णा कल्याणी तुम हो।।
धन दाती माँ कमला हो।
हे अबले! तुम सबला हो।।
धरा रुप धर पालन करती।
गंग तरंग जग पावन करती।।
भगत, जगत सब तेरे
फिर क्यों तू विकला हो।
हे अबले ! तुम सबला हो।।
भूल रही तू निज शक्ति को
किस ममता में पड़कर।
दंभ द्वेष पाखण्ड हरो माँ
जग जननी तू काली बनकर।।
मातृशक्ति भारत की बेटी
तू पूर्वा तुम नवला हो।
हे अबले ! तुम सबला हो।

माँ की आँचल

जब जन्नत की चाहत हो
माँ की आँचल में आ जना।
शाश्वत स्वर्ग सुखों को तुम
पल में आकर पा जाना।।
नंदनवन भी यहीं मिलेगा
यहीं मिलेगा इन्द्रासन।
बेशक मिट्टी के होंगे पर
ऐरावत होगा सुखासन।।
होगा अश्व उच्चैश्रवा
यद्यपि चाबी से चलने वाला।
अपने मन की गति रहेगी
न कोई वैरी छलने वाला।।
मधुर मनोरम गान भी होगा।
अमर सुधा का पान भी होगा।
सर्व सुलभ सुख छोड़ ‘विनयचंद ‘
दूर बहुत मत जाना ।।
माँ की आँचल में आ जाना।
माँ को मत विशराना.. माँ को नहीं भुलाना।।

कर्ज माता पिता का

है मोल कहाँ इस दुनिया में
जो बूंद एक का चुका सके।
मात पिता का कर्ज है कोई
दिल देकर भी मुका सके।।
कहना कभी विरुद्ध नहीं।
होके इन पर क्रुद्ध नहीं।।
सेवा में होवे कमी नहीं।
आँखों में आए नमी नहीं।।
वरद हस्त हो इनका जिसपर
उसे ‘विनयचंद ‘कौन झुका सके।
है मोल कहाँ इस दुनिया में
जो बूंद एक का चुका सके।।

रसखान

पान खाने गया था वो पनवाड़ी के पास।
एक सलौना सा सूरत था नजरों के पास।।
लाल लाल होंठ थे उसके और घुंघराले बाल।
श्याम रंग और तिरछी चितवन टेढ़े मेढ़े चाल।।
कोमल कोमल पाँव मनोहर बिन जूते का देखकर।
चित्रलिखे से बने मियाजी टगे चित्र को देखकर।।
होश में आके पूछ गए ये बालक कौन कहाँ का है।
यमुना तट पर वृन्दावन है ये बालरुप जहाँ का है।।
पान रहा पनवाड़ी के पास भागा वृन्दावन की ओर।
हाथ में जूते और सलवार लेकर पहुँचें भोरे भोर।।
लीलाधर सलवार पहनकर दर्शन दिए सभी को।
विनयचंद के ठाकुर ने दास किया रसखान कवि को।।

हम सब भारतवासी हैं

सौभाग्य हमारा है बंधु, हम सब भारतवासी हैं।
सुखी रहे सब लोग यहाँ, इसके हम अभिलाषी हैं।।
धरती को हम माता कहते
गैया पूजी जाती हैं।
वृक्ष सभी यहाँ देव रूप हैं
नदियाँ पूजी जाती हैं ।।
नाहर बैल हंस नहीं केवल, काग श्वान भी सुखरासी हैं।
सौभाग्य हमारा है बंधु हम सब भारतवासी हैं।।
जाति धर्म का भेद नहीं है ।
काले गोरे का खेद नहीं है।।
शब्द ब्रह्म का आदर करते, बेशक हम बहुभाषी हैं।
‘विनयचंद ‘रे भूप यहाँ पर होता एक सन्यासी है।।

खंजर हीं साथी

देख द्रोपदी तुझे बचाने वाला न कोई अपना होगा।
अपने हीं तो आँचल खींचे
अपने खड़े हैं शीश झुकाए।
बने गुलाम धर्मवीर सब
अंधा राजा देख न पाए।।
नास्तिकता के बीच में कृष्ण का आना सपना होगा।
देख द्रोपदी तुझे बचाने वाला न कोई अपना होगा।।
श्राप अगर देना चाहोगी
गंधारी आएगी आड़े।
नारी का वैरी नारी हो तो
कौन वैरी का बुत्था झाड़े।।
अपनी रक्षा खुद करने को खंजर साथ में रखना होगा।
देख द्रोपदी तुझे बचाने वाला न कोई अपना होगा।।

कलम की लड़ाई आज हम भी करेंगे

कलम की लड़ाई आज हम भी करेंगे।
जनताओं में चेतना
सैनिकों में साहस
देश भक्ति का भाव आज सबमें भरेंगे।
कलम की लड़ाई आज हम भी करेंगे।।
कलम की आंसू आज शोला बनेंगे।
दुश्मनों के ख़ातिर बम गोला बनेंगे।।
‘विनयचंद ‘दुश्मन अब रो रो मरेंगे।
कलम की लड़ाई आज हम भी करेंगे।।

शहीदों को श्रद्धांजलि

विनयचंद यूँ रो रो कर
कितने को श्रद्धांजलि दोगे।
आँसू कम पड़ जाऐंगे तेरे
आखिर कितना रोओगे।।
सभी शहीदों के खातिर
अब अपना शीश झुकाता हूँ।
एक जन्म क्या हर जन्मों में
आभार तेरा फरमाता हूँ।।
जय जवान…. जय हिन्दुस्तान।।

भारत माँ का लाल बनो

खाया नमक देश का तो
थोड़ा नमकहलाल बनो।
बेशक बिपक्ष बन बैठे हो
पर भारत माँ का लाल बनो।।
समर मरन और शत्रु दलन का
सबूत मांगना क्या समीचीन है ?
प्रमाण चाहिए खोतों को तो
तेरा ठीकाना वही पाक व चीन है ।।
शर्म करो कुछ निज पुरखों पर
जो (42 हजार वर्ग किलोमीटर )
बृहत भूभाग गवाया था।
निज करणी के कारण हीं तो
अपना हिन्दुस्तान लजाया था।।
शमशीर ‘विनयचंद ‘बन न सको
तो ,एक अटूट-सा ढाल बनो।
नमक खाया देश का तो
थोड़ा नमकहलाल बनो।
बेशक बिपक्ष बन बैठे हो पर
भारत माँ का लाल बनो।।

वीर गीत

एक हाथ में ध्वजा तिरंगा, काँधे पर बन्दूक हैं।
भारत माँ का वीर सिपाही, लक्ष्य बड़ा अचूक है।।
कदम चाल में चलते हमसब, भारत माँ की रक्षा में।
रहे सुरक्षित शरहद अपनी, वैरी न आए कक्षा में।।
देश धर्म पे बलि-बलि जाऊँ, शपथ बड़ा अटूट है।
भारत माँ का वीर सिपाही……………………………….।।
चाह नहीं अपनी है वीरों, दुनिया पर अधिकार करें।
लेकिन अंगुल एक धरा का, कभी नहीं हम हार करें।।
“विनयचंद “इस दिल में केवल देश प्रेम अटूट है।
भारत माँ का वीर सिपाही……………………….।।

चंदन तुम सर्प लपेटे रहते हो

चंदन ! तुम सर्प लपेटे रहते हो।
तुम शीतल हो तुम निर्मल हो,
खुशबू तेरे भीतर है।
वैर नहीं है तुम्हें किसी से
हृदय बड़ा पवितर है।।
मलयाचल पर बने तपस्वी
दूर अकेले रहते हो।
चंदन ! तुम सर्प लपेटे रहते हो।।
एक शंकर कैलाश के वासी
सर्पों के मालाधारी हैं।
जहर हलाहल पीकर शंभु
अभयंकर त्रिपुरारी हैं।।
नीलकंठ का नीलापन
तुम भी तो ढक सकते हो।
चंदन ! तुम सर्प लपेटे रहते हो।।
कैलाश शिखर पर जिनका वंदन।
वो तो हैं प्रभु दुष्ट निकन्दन।।
मलय गिरी जब आते हैं।
तपसी रूप हो जाते हैं।।
“विनयचंद “मंगलकारी के
क्यों न संग समेटे रहते हो?
चंदन !. तुम सर्प लपेटे रहते हो।।

हम भारत हैं

सारे जहाँ से अच्छा “जो कह दे
वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
“हिन्दोस्तां हमारा ” कह दे
वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
अपने देश को अपना कहो तो
आखिर क्या घट जाएगा?
ध्वजा तिरंगा के खातिर
अपना शीश कट जाएगा।
छाती ठोक कहने वाला
“आजाद”लाल कहाँ से लाऊँ?
कोई हिन्दू बन लड़ता है
कोई मुस्लिम का सरदार।
सिक्ख ईसाई दलित बना सब
कोई बाभन का अवतार।।
“हिन्दी हैं हम” कहने वाला
वो इकबाल कहाँ से लाऊँ?
बाँट के सबको जाति धरम में
आपस में लड़वा दे जो।
करा के दंगा हर कूचे में
आम खास मरवा दे जो।।
ऐसे नेता के झाँसे में
‘विनयचंद ‘ हरगिज़ न आऊँ।
हम भारत हैं भारत अपना
यही गान मैं दिल से गाऊँ।

कैसा ऋण है तेरा मुझ पर

है प्रेम न कोई रिश्ता तुझसे पर तेरे घर मैं आता हूँ।
कैसा ऋण  है तेरा मुझ पर दिल देकर उसे चुकाता हूँ।।
पकड़े थे मेरे बाहों को तुमने,
ऐसा हुआ आभाश नहीं ।
एक दिन अपनाओगे मुझको,इसकी कोई आश नहीं।।
एकतरफा है प्यार मेरा,मैं अपना फर्ज निभाता हूँ।।कैसा ऋण…
देवे दुनिया गाली मुझको
या बदनामी का हार मिले।
था आता और रहूँगा आता
चाहे कुत्ते -सा दुत्कार मिले।।
पागल मन मेरा ना समझे ,
मैं कितना इसे समझाता हूँ।।कैसा ऋण…
अपना-अपना करके मैं,
अपने को भी भूल गया।
मृग -मरीचिका देख धरा पर,
तन मन मेरा फूल गया।।
है गीत तुम्हारे राग तुम्हारे
ना रोता हूँ न गाता हूँ।।कैसा ऋण….

माँ! मुझे फौज में भेज दे

माँ ! मुझे फौज में भेज दे।
ना बेटा ! अपने मन को जरा परहेज़ दे।।
बन जा बेटा आॅफिसर तू
राज करोगे जनताओं पर।
पब्लिक से नेताओं को भी
नाज रहेगा सेवाओं पर।।
साहेब बनकर जीना बेटा
तन मन को कर अंग्रेज दे।
ना बेटा अपने मन को जरा परहेज़ दे।।
अधिकारी और डाक्टर की सेवा
बेशक एक आफताब है माँ।
शिक्षक और नेता की सेवा
दुनिया में माहताब है माँ।।
पूत सपूत बनूँ मैं तेरा
मुझमें देशभक्ति लबरेज दे ।
माँ ! मुझे फौज में भेज दे।।
हठ करके तू माँ के दिल को
क्यों करता मजबूर है।
बाल हठ को दुनिया माने तो
तिरिया का हठ भी मशहूर है।।
कैसे कह दूँ बेटा मेरे
शहादत का तू दहेज दे।
ना बेटा ! अपने मन को जरा परहेज़ दे।।
बहुत कमाने पैसा माता
क्यों न जाऊँ विदेश में।
बाहर भीतर इज्ज़त होगी
क्या रखा स्वदेश में।।
सिर्फ कुछ सालों तक पत्थर का करेज दे।
ना बेटा अपने मन को जरा परहेज़ दे।।
तेरे पीछे क्या बनेगा
कौन करेगा मेरी राखी।
ऐसे हीं भारत माँ की
मुझे करने दो माँ राखी।।
ब्रह्माणी से क्षत्राणी बन
क्षत्रिय धर्म सहेज दे।
माँ ! मुझे फौज में भेज दे।।
बहुत करी परीक्षा तेरी
तेरे मन को पढ़कर।
मातृभूमि तो बेटा मेरे
माँ से भी है बढकर।।
“विनयचंद “तव दामन भर दूँ
दुआ-ए-परवेज से।
माताओं के माँ के खातिर
तन मन धन सब त्येज दे।
जा बेटा ! शरहद को तू सहेज दे।।
आफताब ःः सूरज
माहताब ःः चन्द्रमा
परवेज ःः विजय, शांति

क्योंकर छिलका खाए कृष्णा

क्योंकर छिलका खाए कृष्णा?
इतिहास हमारा क्या कहता है ?
क्या मतलब है इसका कहना?
एक प्रश्न मन पूछ रहा है
क्योंकर छिलका खाए कृष्णा?
कदलीवन नारायण को प्यारा
कदली से नित होती पूजा।
तभी विदुरजी का कदलीवन
कृष्णा को राजसभा से सूझा।।
प्रेम के वस हो मांग लिए
कुछ खाने को कृष्णा।
क्योंकर छिलका खाए कृष्णा?
भगवान अगर गुद्दा खाए तो
भक्त भला क्या खाएगा?
दम्भ पाखण्ड के भीतर कैसे
मधुर सरस रस रह पाएगा ?
“विनयचंद ” रे मान सदा
ये इतिहास का कहना ।
सचमुच छिलका खाए कृष्णा।।

कान्हा के मुख कान्हा

कान्हा तूने माटी खाई
डाँट के बोली मैया।
ना ना कह शीश हिलाया
नटखट बाल कन्हैया।।
छड़ी दिखाकर मैया बोली
मूंह तो खोलो कान्हा।
मुख में सारा विश्व दिखाया
कन्हा मुख में कान्हा।।
मायापति की माया में
मैया बेहोश पड़ी थी।
दूर हुई कान्हा की माया
मैया स्वस्थ खड़ी थी।।
विनयचंद ऐसे मायापति का
निश दिन ध्यान धड़ो रे।
जीवन को न माया ठगेगी
अपना कल्याण करो रे।।

दुनिया एक रंगमंच

दुनिया रुपी रंगमंच पे
नाटक निश-दिन होता है।
कभी प्यार है,
कभी पछाड़ है।
नाचे गाए कोई
कोई हँसता रोता है।।
नाटक के इस पृष्टभूमि पर
सकल जीव अभिनेता है।
कोई बना किसान यहाँ पर
कोई सेवक और कोई नेता है।।
कोई टमाटर ऊपजाए
बीच सड़क कोई खाए 🍅
ऐसा भी कोई खोता है।।
दर्शक और निर्देशक का
ध्यान भला जो रखता है।
वही सफल खिलाड़ी है
वही मधुर फल चखता है।।
‘विनयचंद ‘इस नाट्यजगत में
नित पटपरिवर्तन होता है।।

भीमसेनी एकादशी

निर्जला एकादशी की महात्म्य कथा

की विनती थी भीमसेन ने
प्रभु वेद व्यास के चरणों में।
उपवास एकादशी करते हैं
रख प्रीत सभी हरि चरणों में।।
वृक अग्नि नित जलती है
पितामह मेरे पेट के भीतर।
शांत न होती तबतक जबतक
अन्न अकूत न डालूँ भीतर।।
मैं भी करूँ उपवास सदा
ये कहते मुझ से सब भ्राता।
मात्र एक व्रत बतलाओ प्रभु
हो पापहारिणी बहुसुखदाता।।
जेठ शुक्ल की एक एकादशी
निर्जल होकर रख लो भीम।
जन्म जन्म के पाप कटेंगे
सुख पाओगे वत्स असीम।।
प्रकाश में लाया भीमसेन ने
एतदर्थ भीमसेनी कहलाती है।
अश्वमेध सहस व वाजपेय सौ
यज्ञ फल की ये महती दाती है।।
पठन श्रवण जो करे हमेशा
‘विनयचंद ‘महात्म एकादशी।
सुख शांति से जीवन कट जाए
कभी न आए बीच उदासी।।

नेता और अभिनेता

नेता से अभिनेता अच्छा
ये मेरा मन भी कहता है।
कभी हँसाए
कभी रुलाए
कभी उपदेशक बन कहता है।
नेता से अभिनेता अच्छा है
ये मेरा मन भी कहता है।।
कभी दिलाए गुस्सा
और कभी बने मुहद्दुसा
ऐसा जोकर बनकर यारों
कष्ट सभी का हरता है।
नेता से अभिनेता अच्छा है
ये मेरा मन भी कहता है।।
नाटक खेल झूठ का है
पर राजनीति तो सच्ची है।
सेवा भाव दिल धर्म भरा हो
देश भक्ति बड़ी अच्छी है।।
ऐसा नेता भी अच्छा है
ये मेरा मन भी कहता है।।

अनोखा रिश्ता

दो मित्रों का जोड़ा भैया
अमर इतिहास बनाया था।
एक थे ब्राह्मण एक मुस्लिम थे
रिश्ता खास बनाया था।।
जंग- ए-आजादी में कूद गए थे
राम -लखन की जोड़ी बनकर।
“सरफरोशी की तमन्ना “गाए फिरते
गली-गली और घर-घर चलकर।।
क्रांति का पथ प्रशस्त किया
और मातृभूमि को वास बनाया था।। दो मित्रों ़़़़़़।।
हृदय एक थे दोनों के
बेशक़ तन थे अलग- अलग।
राम लखन संबोधन करते
जब भी होते अलग- अलग।
एक साथ हीं झूल गए थे
बली रज्जु खास बनाया था।। दो मित्रों ़़़।।
अमर अनोखा ऐतिहासिक रिश्ता
आखिर जग क्यों भूल रहा।
“सह न ववतु़़”का भाव सदा
भारतभूमि पे मूल रहा।।
‘विनयचंद ‘ जयचंद बनो ना
देश को दास बनाया था।। दो मित्रों ़़़़़।।

धर्म के निकेतन

एक पीड़ है हृदय में
एक दर्द है भयंकर।
तड़प रही है धरती
और रो रहा है अंबर।।
जिसने मुझे है लूटा
ज़िन्दगी बनाई बदतर।
कहता मुझे लुटेरा
आखिर बताओ क्योंकर।।
मेहमाॅ बनाके जिसको
रखा था घर में अपने।
मालिक -सा वो बनकर
घर को लगे हड़पने।।
कुछ तो करो ‘विनयचंद ‘
भगवान से निवेदन।
इंसान से भरा हो
ये धर्म के निकेतन।।

अब क्या देखूँ हे गिरिधारी

इन अँखियों ने देखी बड़ दुनिया
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?
जब भी देखा दुनिया में तो
देखा पंचविकार कबाड़ी।।
काम दिखा और लोभ दिखा।
मोह महामद क्रोध दिखा।।
इन पांचों ने मिलकर
मुझको बना दिया दुराचारी ।।
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?
बाहर -भीतर तुम हीं तुम हो
फिर क्यों देखूँ बाहर संसार?
अन्तर्मन का नयन खोल रे
‘विनयचंद ‘एक बार।
बिन अँखियाँ तुझे दर्शन देंगे
हरदम कृष्ण मुरारी।।
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?

सत्य सूर्य

चमक उठा जब चांद गगन में
कोटि सितारे टीम -टीम रह गए।
सूरज के आने से पहले हीं
सब के सब ये मद्धिम रह गए।।
लाख हौसला हो जुगनू में
अन्धकार कब मिटा सका है।
छल का बादल प्रेम जगत में
सत्य सूर्य कब मिटा सका है।।
प्रेमी बनकर ‘विनयचंद ‘तू
प्रेम का नित संचार करो।
मानव जीवन को पाकर
जीवन को साकार करो।।

तपस्वी का भारत

सचिव सयाने कुटिया में
रहते थे चाणक्य यहाँ पर।
निर्मल हृदयकुञ्ज मनोहर
निर्मल गंगा बहे जहाँ पर।।
एक छत्र राज था भारत
मुँह की खाई जहाँ सिकन्दर।
ह्वेनसांग भी हतप्रभ रह गया
झाँक झाँक भारत के अन्दर।।
जब शासक शोषक बन जाए
प्रजातन्त्र ये आखिर कैसा?
‘विनयचंद ‘ कुछ करो विचार
कैसे बने ये पूर्व के जैसा।।

नीम दादा

दादाओं के भी दादा थे
वो ना जाने
कितने युगों से
खड़े थे एक पाँव पर
अपने घर के पास।
खेल कबड्डी
गिल्ली डंडे
भाग भाग के
आँख मिचौनी
खेला करते
सदा हीं
उनके आस-पास।।
भूख लगी
होगी बच्चों कै
जान कुछ फल
फैला देते थे नीचे।
हम भी उन
विद्रुम सम फल
को चुन-चुन
बड़े चाव से
खा जाते
अँखियों को मीचे।।
एक दिन रोना
आया हम सबको
आँसू के धार
बहे पुरजोड़।
कारण कि
उनके ऊपर
क्रुर कपूत ने
आकर कुल्हाड़ी से
प्रहार बड़ी जोर।।
काट -काट के
कर के टुकड़े
सब ले गया
अपनी नजरों से दूर।
इस गलती
का हर्जाना
कौन भड़ेगा
अब सब
हो गए मजबूर।।
कीट कीटाणु
और विषाणु
फैल गया बिमारी बनकर।
‘विनयचंद ‘
नादान बनो मत
बृक्ष पितर की रक्षा
कर नित हितकारी बनकर।।

पं़विनय शास्त्री ‘विनयचंद’

माँ और रोटी का खुरचन

जब भी देखता हूँ मैं
इस रोटी के खुरचन को
तो माँ आ जाती है यादों में।
तवे पे रोटियाँ बनाती जब
जला -जला के रोटियाँ की
सौंधी सुगन्ध फैल जाती वातों में।।
तोड़ -तोड़ के खुरचन सारे
करती साफ रोटियों को।
चुपड़-चुपड़ घी से मैया
हमें खिलाती रोटियों को।
जब पूछता कारण इसका
मुस्कुरा के रह जाती माता।
आ परदेश में अपने हाथों
बना के रोटी जब भी खाता।।
मैया याद में आती है और
खुद हीं समझ जाता हूँ मैं।
सेहतमंद यही रोटी है
सबको अब बतलाता हूँ मैं।।

पं़विनय शास्त्री

अंधा और लंगड़ा

एक था अंधा
एक था लंगड़ा ।
दोनों का याराना
हो गया तगड़ा।।
आग लगी
जब गाँव में ।
सब भागने लगे
शीतल छाँव में।।
कोई बता न पाया
अंधा को।
कोई भगा न पाया
लंगड़ा को ।।
अंधे का सहारा लंगड़ा
और लंगडे का सहारा अंधा।
राह बतावे लंगड़ा
चढ़ ऊपर अंधे का कंधा।।
बचाव हुआ दोनों का
और बन गए एक मिसाल।
‘विनयचंद ‘जो नेक भाव हो
सब रहे सदा खुशहाल।।

गोरकुन

कहते हैं किसको हँसना
गमगीन ज़िन्दगी है।
मिट्टी करे समर्पित
अश्कों से बन्दगी है।
हरदम रहे वो गीला
उसका सदा हीं जून है।
क्या नाम दूँ मैं उसको
वो एक गोरकुन है।।

पं़विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘

क्यों छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाते हो?

क्यों छोटी -छोटी बातों को बड़ा बनाते हो?
भोली-भाली जनताओं से बगावत कराते हो।।
क्या कभी जनताओं को सत्य से रुबरू कराते हो?
कोड़े कागज पर दस्तखत से पहले शर्त समझाते हो?
फिर क्यों छोटी -छोटी बातों को बड़ा बनाते हो?
जनताओं को हथियार की तरह इस्तेमाल मत करो।
भारी पलड़ा से उठा -उठा कर अपनी जेब मत भड़ो।।
हल्के को भारी करने का क्या यही एक तरीक़ा है?
दंगा और बगावत फैला कर जीवन का रंग फीका है।।
जब हर बात बात में कानून बतियाते हो।
फिर क्यों छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाते हो?

पं़विनय शास्त्री (गौशाला वाले)

माँ और मातृदिवस

मातृदिवस पर माँ को बच्चे
याद बखूबी करते हैं।
सोशल मीडिया पर आकर
अह्लाद बखूबी करते हैं।
माँ ने अपने दूध की ममता
फेसबुक पर डाला क्या?
दिल के एस डी कार्ड से भैया
तेरा फोटो निकाला क्या?
ऐसी ममतामयी को केवल
न फेसबुक पर याद करो।
‘विनयचंद ‘कुछ समय निकालो
बैठ पास में बात करो।।

मातृभूमि

कुछ खट्टी कुछ मीठी
बातों को
सुनने और सुनाने को
जी करता है
मेरा जब भी
तेरी आँचल में
आ जाता हूँ।
तू जननी है
जन्मभूमि है
तेरी गोद में
आकर मैया
सुख जन्नत
का पा जाता हूँ।।

पं़विनय शास्त्री

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